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20 साल बाद मिला न्याय: बिजली चोरी के आरोप से बरी हुए देवेश कुमार, अदालत ने साक्ष्य के अभाव में सुनाया फैसला
फिरोजाबाद। बिजली चोरी के एक पुराने मामले में करीब दो दशक तक चली कानूनी जंग के बाद आखिरकार एक उपभोक्ता को अदालत से राहत मिल गई। विशेष न्यायाधीश (विद्युत अधिनियम) एवं अपर सत्र न्यायाधीश साक्षी शर्मा की अदालत ने साक्ष्य के अभाव में देवेश कुमार सागर को दोषमुक्त करार देते हुए बरी कर दिया। फैसले के बाद परिवार में राहत का माहौल है।
2005 में दर्ज हुआ था मामला
मामला थाना दक्षिण क्षेत्र के स्टेशन रोड स्थित इस्लामगंज निवासी देवेश कुमार सागर से जुड़ा है। 27 दिसंबर 2005 को दोपहर करीब 12 बजे विद्युत विभाग की विजिलेंस टीम ने उनके घर पर जांच की थी। विभाग ने एलटी लाइन में कट दर्शाते हुए बिजली चोरी का आरोप लगाया और तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कराया। बाद में आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया और मामला सुनवाई के लिए चला।
अदालत में कमजोर पड़े विभागीय दावे
सुनवाई के दौरान विभाग की ओर से दावा किया गया कि मौके से 11 मीटर केबल बरामद की गई थी। लेकिन जिरह में विभागीय कर्मचारी यह स्पष्ट नहीं कर सके कि चेकिंग रिपोर्ट किसने तैयार की थी और किन परिस्थितियों में तैयार की गई। कथित रूप से जब्त की गई केबल भी न्यायालय में पेश नहीं की जा सकी।
अदालत द्वारा कई बार अभियोजन पक्ष के गवाहों को तलब किया गया। जमानती और गैर-जमानती वारंट जारी होने के बावजूद गवाह उपस्थित नहीं हुए। पर्याप्त और ठोस साक्ष्य के अभाव में न्यायालय ने अंततः उपभोक्ता को बरी कर दिया।
समझौते के प्रस्ताव ठुकराए
देवेश कुमार ने बताया कि वर्ष 2016 में विभाग की ओर से 50 से 56 हजार रुपये के भुगतान पर सुलहनामा करने का प्रस्ताव दिया गया था। जुर्माना कम करने का आश्वासन भी दिया गया, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि यदि उन्होंने समझौता कर लिया होता तो वे जीवनभर बिजली चोरी के आरोपी कहलाते।
करीब 20 वर्षों तक चले इस मुकदमे में उन्होंने लगभग 40 से 45 हजार रुपये खर्च किए और कई बार नौकरी से अवकाश लेकर अदालत में पेशी देनी पड़ी।
घरेलू कनेक्शन में भी आई बाधा
बिजली चोरी के आरोप के चलते उन्हें लंबे समय तक घरेलू बिजली कनेक्शन नहीं मिल सका। मजबूरी में उन्होंने घर की आपूर्ति पत्नी के नाम पर लगे कॉमर्शियल मीटर से की। उनका कहना है कि घरेलू कनेक्शन का बिल अपेक्षाकृत कम होता, लेकिन उन्होंने समझौता करने के बजाय न्यायालय में अपनी बेगुनाही साबित करना उचित समझा।
“देर से सही, न्याय मिला”
देवेश कुमार सागर ने आरोप लगाया कि विजिलेंस टीम ने गलत तरीके से चोरी दर्शाकर मुकदमा दर्ज कराया था। हालांकि अदालत के फैसले के बाद उन्होंने कहा कि लंबी लड़ाई के बावजूद उन्हें न्याय मिला और अब मानसिक बोझ समाप्त हो गया है।
यह फैसला न केवल एक उपभोक्ता के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्याय प्रक्रिया में भले समय लगे, लेकिन साक्ष्यों के आधार पर ही अंतिम निर्णय होता है।

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